Sunday, 16 August 2020

यादो का मौसम

 

उसकी याद किसी सुरमई शाम की तरह हैं ! जैसे शाम के आने पर कोई पहरा नहीं बेठा सकता ठीक वैसे ही उसकी यादों को आने से कोई रोक नहीं सकता ! जैसे शाम अपने साथ एक खूबसूरत मंजर ले कर आती हैं ठीक वैसे ही उसकी याद भी उसके साथ बिताये लम्हे अपने साथ लिए चली आती हैं ! कभी कभी मुझे लगता हैं की जैसे मेरी ज़िन्दगी में  हमेशा के लिए पतझड़ का मौसम ठहर गया हैं ! फिर धीरे से उसकी याद अपने साथ बहार का मौसम ले आती हैं ! थोड़े वक़्त के लिए ही सही मगर ज़िन्दगी महकने लगती हैं, बेहद खूबसूरत लगने लगती हैं ! पर कभी कभी उसकी याद तूफान लिए हुए आती हैं, कितनी कोशिश करती हूँ पर कुछ भी संभाल नहीं पाती ! सब कुछ बिखर जाता हैं ! तभी याद आता हैं, की ये तूफान इसलिए अंदर आ पाया क्यूं कि मैं अपने मन की खिड़की बंद करना भूल गई थी ! जैसे ही इसे बंद करने को हाथ बढ़ाती हूँ अहसास होता हैं की ऊपर वाला इस खिड़की में कुण्डी लगाना भूल गया ! मैं कितनी भी कोशिश कर लू इस मन की खिड़की को बंद नहीं कर सकती ! और ना ही तूफान को अंदर आने से रोक सकती हूँ पता नहीं ये कहा का इन्साफ हैं की गलती भी मेरी नहीं और सजा भी मैं ही भुगत रही हूँ !



एक थी अमृता

 

मुक़्क़मल मोहब्बत

यूं तो मैंने बहुत से लोगो की रचनाएँ पढ़ी हैं ! कई कवियों की कविताएं, लेखकों की कहानियाँ, और उपन्यासकारों के उपन्यास ! पर इन सब में सिर्फ दो ही लेखिकाएं ऐसी हैं जिन्होंने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है! इनमे से एक हैं पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम और दूसरी हैं पूजा उपाध्याय ! मैंने अमृता प्रीतम के बहुत सारे लघु उपन्यास और कई कविताएं पढ़ी हैं  ! और यकीन मानिये उनकी हर रचना अपने आप में बेहतरीन और गजब की रूहानियत लिए हुए है ! मोहब्बत को जितनी शिद्दत से उन्होंने जिया हैं , मुझे नहीं लगता किसी और ने कभी उतनी शिद्दत से इस अहसास को महसूस किया हो ! अमृता जी की एक कविता "मैं तैनू फिर मिलांगी" मुझे इतनी पसंद हैं की मैं लफ्ज़ो में बयां नहीं कर सकती ! इस कविता में वो अपने महबूब से अगले जन्म में जिस्म बदल कर फिर मिलने का वादा करती हैं ! उनके जैसी मोहब्बत आज के ज़माने में भला कौन कर सकता हैं ! वो प्यार करती थी साहिर से, इस प्यार को वो अंजाम तो नए दे पाई पर अपनी लेखनी में जैसे उन्होंने अपनी इस मोहब्बत को मुकम्मल कर दिया ! अपनी किताब एक थी अनीता में उन्होंने अपना एक राज ज़ाहिर किया हैं अपनी कहानी की नायिका अनीता के ज़रिये, कि कैसे जब साहिर उनसे मिलने आते थे तो कितनी ही सिगरेट पी जाया करते थे ! अमृता सिगरेट तो नहीं पीती थी, पर साहिर के जाने के बाद वो बची हुई सिगरेट अपनी उंगलियों में फंसाती थी और उन्हें फिर से सुलगा कर पिया करती थी और ऐसा करके वो साहिर को फिर से अपने आस पास महसूस करती थी !साहिर का जन्मदिन भी वो ऐसे ही मनाती थी केक बनाती अपने कमरे में आकर केक के 2 पीस काटती थी और सिगरेट पीते पीते वो केक के दोनों ही टुकड़े खत्म करती थी और ऐसा करके वो दिनभर खुश रहती थी कि उन्होंने साहिर का जन्मदिन मनाया !वैसे तो मुझे सिगरेट शराब पीने वाले लोग कभी पसंद नहीं आये पर उनका मोहब्बत को इस तरह महसूस करना मेरी रूह को छू गया ! अमृता प्रीतम के ख्याल जो उनकी किताबों में कैद हैं अक्सर पढ़ने वालो के दिलो दिमाग़ में एक तूफान पैदा कर देते हैं ! यूं तो अमृता जी के बारे में कहने को बहुत कुछ हैं पर आज के लिए इतना ही काफ़ी हैं बाकि फिर कभी !