सांझ की आँखों में जो दर्द था, वो दर्द उस लड़की को अपनी ही आँखों में झलकता दिखता। जैसे दोनों के बीच कोई अदृश्य डोर हो। वो अक़्सर सोचती—“क्या मैं भी सांझ जैसी ही हूँ? क्या मेरी रूह भी वैसी ही भटकती है, जैसे उसकी?”
उसने टीवी की स्क्रीन से नज़र हटाई और कमरे की खिड़की से बाहर देखा। बाहर हल्की-सी बारिश हो रही थी, बूंदें काँच पर गिरकर धीरे-धीरे बह रही थीं। उसे लगा जैसे ये बूंदें भी कोई कहानी कह रही हों, वो भी बंटवारे की। उस वक़्त उसे याद आया कि अमृता प्रीतम ने अपनी मशहूर कविता ‘आज आखाँ वारिस शाह नूं’ में भी तो यही पुकारा था—दर्द, जुदाई और एक अधूरा घर।
धीरे-धीरे उस लड़की के भीतर एक ख्वाहिश ने जन्म लिया। ख्वाहिश थी बंटवारे की कहानियों को और गहराई से जानने की। अब वो सिर्फ़ नॉवेल्स और फ़िल्मों से संतुष्ट नहीं हो पा रही थी। उसे असलियत छूनी थी। उसे उन गलियों में जाना था जहाँ बंटवारे का ज़ख़्म आज भी सांस लेता है।
उसने तय किया कि अगली बार जब घूमने निकलेगी, तो अमृतसर ज़रूर जाएगी। अमृतसर, जहाँ बंटवारे की कहानियाँ दीवारों पर लिखी हैं, जहाँ जलियांवाला बाग़ की मिट्टी अब भी खून के रंग को समेटे हुए है, जहाँ वाघा बॉर्डर की हवा अब भी अधूरी कहानियाँ कहती है।
वो सोच रही थी—“क्या पता, वहीं जाकर मुझे मेरी रूह का जवाब मिल जाए। क्या पता, वहीं कहीं मेरा ‘घर’ छुपा हो।”
और फिर उसने अपनी डायरी उठाई, जो उसके हर सफ़र की हमसफ़र थी। उसमें उसने लिखा—
"मैं सांझ की तलाश में निकलूँगी। न सिर्फ़ उस किरदार की, बल्कि उस एहसास की, जो मेरी रूह में प्यास की तरह बस गया है। शायद अमृतसर मुझे मेरा जवाब देगा। शायद वहाँ मुझे वो ‘घर’ मिलेगा, जिसे मैं बरसों से ढूंढ रही हूँ।”
कलम रुकते ही उसने गहरी सांस ली और बाहर देखा। बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में वही गंध थी—पुराने वक़्त की, अधूरे सफ़र की, बंटवारे की।
क्या चाहोगे मैं अगला हिस्सा ऐसा लिखूँ कि वो लड़की सचमुच अमृतसर की गलियों में पहुँचे और वहाँ उसे कुछ ऐसा सुराग मिले जो उसके अपने अतीत से भी जुड़ा हो?